गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

श्याम आए तो कह देना छेनू आया था
पिस्तौल मेरे पास भी है पर आज साथ में नहीं। इस पर जवाब - आगे से साथ रखना। ये डाललॉग हमें रोमांचित कर देते थे। शॉटगन की डायलॉग बाजी और विनोद खन्ना की मारक परसेनेल्टी हमारी आयु के बालकों को बेतरह दीवाना बनाती थी। अब जबकि विनोद खन्ना इस दुनिया से चले गए हैं तो उनके किए गए रोल जहन में आ रहे हैं और नोस्टालजिक बना रहे हैं।
पिताजी की साइकिल उठाकर अपने एक साथी को लेकर 25 किलोमीटर दूर गाजियाबाद के नवरंग टाकीज पर 12 बजे की बजाए 3 बजे वाला शो देखा। फिल्म थी मेरे अपने। हीरो थे विनोद खन्ना और विलेन थे शत्रुघन सिन्हा। गुलजार साहब ने असरानी, दिनेश ठाकुर, पेंटल, डैनी पुष्पराज, सुधीर ठक्कर जैसे तमाम संघर्षरत कलाकारों को फिल्म में भर कर युवाओं की बेरोजगारी और दिशाहीनता की समस्या बड़े ही रोचक तरीके से उठाई थी। मरने से पहले मीना कुमारी इस फिल्म में बुढ़िया बनी थीं। एक दोस्त को बिठाकर उस किशोरवस्था में मैंने 50 किलोमीटर साइकिल चलाई थी तो वह इसलिए कि फिल्म मेरे अपने में मेरे दो पसंदीदा कलाकर काम कर रहे थे। शत्रुघन सिन्हा और विनोद खन्ना दोनों ने ही खलनायक बन कर फिल्मों में आए थे और न जाने क्यों मैं इन दोनों को हीरो के रूप में देखना चाहता था। सुनील दत्त ने अपने भाई सोमदत्त को स्थापित करने के लिए कुछ फिल्में बनाई, जिसमें मन का मीत से उन्हें बड़ी उम्मीद थी। अजीब संयोग था कि इस फिल्म की नायिका लीना चंदावरकर और खलनायक विनोद खन्ना सफल हो गए जबकि सोमदत्त नहीं चले। विनोद खन्ना की परसनेलिटी इतनी प्रभावित करने वाली थी कि निर्माता बनती हुई फिल्म में उन्हें ले लेते थे। और विनोद खन्ना किसी भी और कैसेे भी रोल को शायद मना नहीं करते थे। विनोद खन्ना और शत्रुघन सिन्हा दोनों ने लगभग एक ही समय फिल्मों में शुरुआत की और दोनों ही कालांतर में हीरो बने पर शत्रुघन सिन्हा ने इसके लिए खूब प्रयास किया जबकि विनोद खन्ना स्वाभाविक तौर पर पाला बदलते चले गए। हालांकि शत्रुघन सिन्हा ने खुद को विलेन के रूप में जबरदस्त रूप से स्थापित कर लिया था, जबकि विनोद खन्ना कोई भी रोल पकड़ रहे थे, चाहे खलनायक का हो, सहनायक का या फिर नायक का। जिस तरह आई मिलन की बेला में राजेंद्र कुमार के सामने धर्मेंद्र, परवाना में नवीन निश्चल के सामने अमिताभ बच्चन खलनायक होने के बावजूद नायक पर भारी पड़े, उसी तरह आन मिलो सजना में विनोद खन्ना विलेन होने के बावजूद राजेश खन्ना को बौना साबित कर रहे थे। मेरा गांव मेरा देश में अलबत्ता हीरो धर्मेंद्र और विलेन विनोद खन्ना की टक्कर देखते ही बनती थी। यह फिल्म जबरदस्त सफल हुई थी और उन दिनों जैसे इस फिल्म के ही चर्चे थे। विनोद खन्ना ने सहनायक के रूप में अपनी अलग छाप छोड़ी। उन्होंने कभी सहनायक की भूमिका से गुरेज नहीं किया। पूरब और पश्चिम में मनोज कुमार के साथ और सच्चा झूठा में राजेश खन्ना के साथ सहनायक होने के बावजूद विनोद खन्ना अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व से खास असर डालते हैं। यही कारण रहा कि फिल्म निर्माताओं ने उन्हें हीरो बनाने में खुद ही देर नहीं की। इसके बावजूद वह सह नायक के रूप में आते रहे। उन्हें अकेले हीरो बनने की कोई जिद नहीं थी। उनका फिल्मों में कद बढ़ता जा रहा था एेसे में कुछ एकल हीरो वाली फिल्में भी आईँ और विनोद खन्ना उनमें जबरदस्त रूप से सफल हुए। अचानक विनोद खन्ना की अचानक आई फिल्म थी। हालांकि नानावती कांड पर सुनील दत्त की फिल्म पहले भी आ चुकी थी पर उसी कहानी का पुट लेकर बनी अचानक बेहद रोचक बनी थी और यह विनोद खन्ना की एकल सफल पहली फिल्म मानी जा सकती है। उसके बाद इम्तिहान भी अच्छी फिल्म थी। यानी एकल हीरो के रूप में तो उनकी गिनी चुनी फिल्में आईं जबकि अौर नायकों को साथ लेकर अनेक फिल्में आईं। और विनोद खन्ना सफल भी अन्य नायकों के साथ की गई फिल्मों में हुए। हाथ की सफाई फिल्म के लिए विनोद खन्ना को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला लेकिन सह नायक के रूप में। इसमें नायक रणधीर कपूर थे। उनकी माइलस्टोन फिल्मों कच्चे धागे में वह कबीर बेदी के साथ थे तो जमीर, हेराफेरी, खून पसीना, अमर अकबर एंथनी, परवरिश, मुक्कद्दर का सिकंदर जैसी तमाम हिट फिल्मों में अमिताभ बच्चन के साथ थे। कुर्बानी में फिरोज खान के साथ उन्हें जबरदस्त सफलता हासिल हुई। और जब वह अमिताभ जैसे सुपर स्टार को टक्कर देते नजर आ रहे थे तभी उन्हें लगा कि फिल्मों में मुझे जो करना था वह कर लिया अब संन्यास ले लेना चाहिए।
विनोद खन्ना का सब कुछ छोड़कर रजनीश के आश्रम में चला जाना वास्तव में बहुत दिल दुखाने वाला वाकया था। हमें कोफ्त होती थी यह सोच कर इतना लाजवाब एक्टर कहां रजनीश के जाल में फंस रहा है। लगा अब इस एक्टर का कैरियर खत्म। लेकिन चार साल बाद विनोद खन्ना ने वापसी की और फिल्मों में जैसे उन्का इंतजार हो रहा था। वे फिर से हीरो बन कर स्थापित हो गए। वापसी के बाद दयावान उनका सबसे बड़ा शो था। और बढ़ती उम्र के साथ श्रीदेवी के साथ उनकी रोमांटिक फिल्म चांदनी ने भी खूब ख्याति बटोरी। हालांकि यह चिकने चुपड़े हीरो ऋषि कपूर के साथ थी। विनोद खन्ना कभी खाली नहीं बैठे उन्हें फिल्में मिलती रहीं। 2009 में वांटेड में वह सलमान के पिता बने औऱ छोटी सी भूमिका में भी जान डाल दी। उसके बाद सलमान ने उन्हें अपनी सीक्वल फिल्म दबंग के दोनों संस्करणों में अपने पिता की भूमिका दी। शाहरुख खान की फिल्म दिलवाले विनोद खन्ना की अंतिम फिल्म साबित हुई।
रणजी मैच कवर करने के लिए वानखेडे स्टेडियम गया था। वानखेडे के प्रांगण देखा अपना हीरो विनोद खन्ना कुछ लोगों के साथ मंच पर बैठा है और लोग उसे सुन रहे हैं। मैं भी अनायास ठहर गया। कुछ स्थानीय समस्याओं पर बात चल रही थी। मुलाकात संभव नहीं थी सो मैं मनभर विनोद खन्ना को देखकर अपने होटल लौट लिया। उसके बाद देखा तो खन्ना साहब ने राजनीति में भी दखल रखा और भाजपा सरकार का मरते दम तक हिस्सा रहे।

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

पहचानो, बताओ और जीतो ५०,००० रुपये

विपिन कुमार बहुगुणा
एक प्रसिद्ध हीरोइन की तस्वीर परदे पर दिखाई जा रही है और एंकर आह्वान कर रहा है कि देखो, पहचानो और बताओ ये कौन है. कोई कभी कभार फिल्म देखने वाला भी बता सकता है कि ये हेरोइन काजोल है अथवा करीना कपूर है. पर जाने क्यों कोई भी नहीं बता पा रहा. रह रह कर घंटी बज रही है. लोग कुछ भी बता रहे हैं पर सही नाम नहीं बता रहे हैं.ये लोग क्या उन्ही लोगों का फ़ोन उठा रहे हैं, जिन्हें कुछ नहीं पता. साफ़ लग रहा है कि कुछ गड़बड़ है. लेकिन टीवी पर गड़बड़ प्रोग्राम कैसे चल सकते हैं. और ऐसे प्रोग्राम आजकल टीवी पर बहुतायत में जारी हैं.
मैंने सोचा कितने भोले लोग फ़ोन करने पर लगे हैं. हमें तो पता है कि ये करीना कपूर हैं तो बता देते हैं. फ़ोन उठाया और लगे मचलने बताने कि लिए. एकदम से फ़ोन लग गया. आप लाइन में हैं. आपकी कॉल हमारे लिए बहुत ज़रूरी है. लाइन में बने रहें. आप ५०,००० रुपये जीत सकते हैं. बस आपको थोड़ा इंतजार करना होगा.
टीवी में लगातार एंकर आह्वान कर रहा है कि जल्दी कीजिये, फ़ोन उठाइए, पहचानिए और बताइए कि ये कौन है. हम फ़ोन पर इंतज़ार कर रहे हैं कि सही बताएँगे पर टीवी पर जिनके फ़ोन उठाये जा रहे हैं वो गलत पर गलत बताये जा रहे हैं. हम झुंझलाए  जा रहे हैं और सही बताने के लिए बेताब हुए जा रहे हैं. फिर एक और फ़ोन आया और उसने इस तस्वीर वाली हेरोइन को मुधुबाला बताया. मैं फिर झुंझलाया. मधुबाला, क्या कह रहा है. किस ज़माने कि हेरोइन को किस ज़माने कि बता रहा है. जब कन्फर्म नहीं था तो बताने की क्या ज़रुरत थी. मेरा नंबर तो लग नहीं रहा और ऐसे फालतू लोगों का नंबर लग रहा है. साफ़ साफ़ करीना कपूर की फोटो है. इस समय भी उसकी दो फिल्मे सिनेमाहाल में चल रही हैं. फिर ये सब क्यों नहीं पहचान रहे. इतनी मशहूर हेरोइन है. मुझे ही बताने का मौका मिल जाता तो बता देता. ८ मिनट हो गए थे. मेरे फ़ोन पर वही रटंत विद्या चल रही थी. आप लाइन पर बने रहें. इतने में दोस्त का फ़ोन लैंड लाइन पर आया. उसने शिकवा किया. क्या यार मोबाइल बुस्य रखते हो. मैंने झट बताया, यार वोह लोगों को समझ ही नहीं आ रहा टीवी पर साफ़ साफ़ करीना कपूर दिखाई जा रही है पर कोई पहचान ही नहीं पा रहा. मैंने फोन मिलाया हैं और मैं सही बताने वाला हूँ. दोस्त पहले तो हंसा फिर बोला अबे जल्दी से काट मोबाइल की कॉल लग रही हैं. मैंने कहा वो तो लगेगी ही. तो क्या हो गया. इनाम भी तो ५०,००० का है. दोस्त कहने लगा पहले मोबाइल से नंबर काट फिर बताऊंगा. मैंने कहा अभी १२ मिनट हो गए हैं. बस अब लगने ही वाला है. क्यू में हूँ यार समझता नहीं तू. वो बोला मैं तो समझता हूँ पर तू नहीं समझ रहा पहले फोन काट वो वाला. फिर बताता हूँ कहानी क्या है. मैंने मन मसोस कर फोन काट दिया. और दोस्त से बोला. अब बता मामला क्या है.
दोस्त ने बताना शुरू किया. ये सब मिली भगत का मामला है. जितनी देर तुम्हारी कॉल रहेगी १२ रुपये प्रति मिनट के हिसाब से पैसे बनते रहेंगे. अब तुम अपना बैलेंस देखोगे तो पाओगे वो सॉ रुपये से भी अधिक कट गया होगा. आप जैसे समझदार देश में बेहिसाब हैं. वो सब लाइन मिला कर प्रोग्राम देख रहे होंगे और अपनी कॉल लगने का इंतज़ार कर रहे होंगे. उनके अपने आदमी इस दौरान गलत सलत बता कर टाइम पास कर रहे हैं और आप खिज़ते जा रहे हैं क़ि कोई सही क्यों नहीं बता रहा. यही खेल है प्यारे. खेल खेल में खेल हो रहा है. आप देखते रहो बताने का इंतजार करते रहो और आपके खीसे से रूपये का बोझ कम होता रहेगा.
लेकिन ये धोखाधड़ी खुलाम्खुला कैसे चल रही है.
बस ऐसे ही है. प्रोग्राम से पहले चेनल ने दिखा दिया होगा क़ि इस प्रोग्राम से उनका सरोकार नहीं है या ये विज्ञापन कार्यक्रम है. अब आप जाने और आपका भाग्य. फंसो तो ठीक न फंसो तो आपकी किस्मत. लुटो तो ठीक बच जायो तो ठीक. राम क़ि नगरी है लूट सके जो लूटे. फोन के ऐसे प्रोग्राम तो और भी बहुत हैं. जैसे आप अपना भविष्य जानिए. एकदम मुफ्त. पर कॉल के पैसे तो हिडन हैं. वो तो आपको तब पता लगेगा जब आप बिल देखेंगे या बैलेंस देखेंगे. तब पता चलेगा क़ि कैसे कई सौ रुपये आपके भविष्य बताने वाले ने बैक डोर से ले लिए. भविष्य बताने वाला बहुत आहिस्ता आहिस्ता आपसे जानकारी लेगा. जितना ज्यादा से ज्यादा समय लग सकेगा लगाएगा. आप पंडित जी पंडितजी कहते रहेंगे और वो आपसे कहेगा थोड़ा रुकिए गणना करके बता रहा हूँ. आप भी खुश होंगे क़ि पंडितजी ऐसे ही नहीं बता रहे पूरी ग्रहों क़ि गणना हो रही है. वो अलग बात है क़ि फोन कॉल के पैसे अलग से गिने जा रहे हैं.मैंने पड़ताल क़ि तो एक सज्जन ऐसे भी मिल गए जो अकेले में मन बहलाव के लिए लड़कियों से बात करते रहे सप्ताह भर. उनका मोबाइल पोस्ट पेड़ था. उनके होश फाकता तब हुए जब फोन पर मेसेज आया क़ि अब आपकी  ५००० रूपये क़ि बिल लिमिट ख़त्म हो गयी है. यदि आगे कॉल करनी हो तो कृपया ऑफिस में ५००० रुपये का भुगतान कर दें. ये दिल्ली नगरिया है बबुआ बात करने के पैसे लगते हैं. मुफ्त में कुछ नहीं होता है. कदम कदम पर लूटेरे हैं आपको खुद बचके चलाना है. कोई वैसे जेब काटने को खड़ा है कोई ऐसे भी जेब काट रहा है. मजेदार बात है क़ि आपको पता ही नहीं चल रहा है और आप ख़ुशी ख़ुशी जेब कटवा रहे हैं. है न खेल खेल में खेल.